अगर आप दिल्ली, मुंबई या बेंगलुरु जैसे बड़े शहरों के मेट्रो स्टेशनों या कॉलेजों के बाहर खड़े हों, तो आपको लड़कियों की एक बड़ी भीड़ दिखाई देगी। आंकड़ों के मुताबिक, भारत के इन महानगरों में उच्च शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी 50% है।
क्या आपने कभी सोचा है कि जब भारत के महानगरों में कॉलेज जाने वाले स्टूडेंट्स में हर दूसरी एक महिला है, तो दफ्तरों में उनकी संख्या बहुत कम क्यों है?
क्या आपने कभी सोचा है कि सरकार और परिवार द्वारा लड़कियों की शिक्षा पर हर साल लाखों करोड़ रुपये निवेश किये जाने के बाद भी वे मुख्यत: ‘आदर्श बहू’ या ‘कुशल गृहिणी’ बनने का ख्वाब ही देखती हैं?
क्या आपने कभी सोचा है कि सरकार और परिवार द्वारा लड़कियों की शिक्षा पर हर साल लाखों करोड़ रुपये निवेश किये जाने के बाद भी देश की अर्थव्यवस्था को उनकी प्रतिभा का लाभ क्यों नहीं मिल पा रहा?”
क्या आपने कभी सोचा है कि “जेंडर समानता” की दृष्टि से बड़े शहर आधुनिक और खुले विचारों वाले नहीं हो पाए हैं? क्योंकि बड़े शहरों में भी शिक्षित महिलाएँ मुख्यतः ‘होम-मेकिंग’ और बच्चों के लालन-पालन का ही काम कर रही हैं?”
क्या आपने कभी सोचा है कि 12 साल की स्कूली शिक्षा और 3 साल की कॉलेज शिक्षा भी पितृसत्ता की उन जड़ों को नहीं हिला पाई है, जो महिलाओं की पहचान केवल ‘माँ’ या ‘पत्नी’ के रूप में देखती हैं?
इस तरह के सवालों को समझने के लिए हम भारत सरकार के सांख्यिकी मंत्रालय की जून 2026 की एक ताज़ा रिपोर्ट पर चर्चा करेंगे। इस रिपोर्ट का नाम है – “मिलियन प्लस शहरों में श्रम बाज़ार की स्थितियां।”
इस रिपोर्ट के हवाले से हम उन 46 बड़े शहरों के आंकड़ों का विश्लेषण करेंगे जहाँ उच्च शिक्षा में तो महिलाओं की भागीदारी 50% है, लेकिन रोजगार के मैदान में यह घटकर मात्र 27% रह जाती है।
सवाल यह है कि क्यों हमारी शिक्षा व्यवस्था, पितृसत्ता की जड़ों को हिलाने में विफल रही है? क्यों लाखों करोड़ रुपये खर्च करने के बाद भी शिक्षित महिलाएँ श्रम बल से बाहर हैं? इस लेख में हम इसी तरह के सवालों पर बात करेंगे I
भारत में तेजी से बढ़ती आबादी और गाँवों से शहरों की तरफ लगातार होते पलायन ने रोजगार के बाजार पर बहुत दबाव बढ़ा दिया है। अच्छी नौकरी, बेहतर इलाज और बच्चों की पढ़ाई-लिखाई की उम्मीद में हर साल लाखों लोग गाँव और छोटे कस्बों से बड़े शहरों की तरफ रुख करते हैं। हालाँकि, शहरों में आना हर किसी की किस्मत नहीं बदल पाता। सच तो यह है कि हमारे शहर इतने बड़े पैमाने पर आने वाले लोगों के लिए सही और पक्की नौकरियों का इंतजाम नहीं कर पा रहे हैं।
बड़े शहरों में, जिन व्यक्तियों के हिस्से में नौकरी नहीं आती, उसका कारण केवल योग्यता का न होना नहीं है I बल्कि, किसी का महिला होना नौकरी में नहीं होने का बहुत बड़ा कारण है I जी हाँ, महानगरों में रह रहे परिवार पितृसत्ता के नियमों का पालन बहुत कड़ाई के साथ करते हैंI ये परिवार महिलाओं की डिग्रियों पर सांप बनकर बैठ जाते हैंI जैसे ही कोई महिला अपनी हासिल की गयी डिग्रियों को छूने की कोशिश करती है, वैसे ही डिग्री पर सांप बनकर बैठे परिवार के लोग जहरीली फुफकार मारते हैंI
भारत सरकार द्वारा जारी इस रिपोर्ट में यह बताया गया है कि 10 लाख से ज्यादा आबादी वाले इन बड़े शहरों में काम करने वाले पुरुषों और महिलाओं की संख्या कितनी है। रिपोर्ट के मुताबिक, छोटे शहरों के मुकाबले इन बड़े शहरों में महिलाओं को पक्की (रेगुलर) नौकरी मिलने के मौके तो ज्यादा हैं, लेकिन कमाई के मामले में वे अभी भी पुरुषों से काफी पीछे हैं और उन्हें कम पैसे मिलते हैं।
जिन ‘मिलियन-प्लस’ शहरों के लोगों पर यह अध्ययन किया गया उनमें से कुछ शहरों के नाम इस प्रकार हैं –
विशाखापटनम, विजयवाड़ा, पटना, रायपुर, दिल्ली, अहमदाबाद, राजकोट, सूरत, वडोदरा, फरीदाबाद, श्रीनगर, धनबाद, रांची, बेंगलुरु, भोपाल, ग्वालियर, इंदौर, जबलपुर, मुंबई, पुणे, नागपुर, नासिक, ठाणे, अमृतसर, लुधियाना, जयपुर, जोधपुर, कोटा, चेन्नई, कोयंबटूर, मदुरै, हैदराबाद, आगरा, गाजियाबाद, कानपुर, लखनऊ, मेरठ, प्रयागराज, वाराणसी, हावड़ा, कोलकाता आदि।
अपनी बड़ी आबादी के साथ-साथ ये ‘मिलियन-प्लस’ शहर रोज़गार, व्यापार, उद्योग और शिक्षा के प्रमुख केंद्र भी होते हैं।
सर्वे में उन्हीं लोगों को शामिल किया गया जिनकी उम्र 15 साल या उससे अधिक थी I
रिपोर्ट की पेज संख्या 4 पर एक टेबल दी गयी है :
इस टेबल से पता चलता है कि सर्वेक्षण के एक भाग के लिए देश के कुल 46 मिलियन-प्लस शहरों के 19,541 परिवारों को शामिल किया गया। उन परिवारों के कुल 60,843 लोगों को शामिल किया गया है, जिनमें 29,705 महिलाएं और 31,131 पुरुष शामिल हैं।
सर्वेक्षण के दूसरे भाग के लिए शहरी भारत के 1,21,754 परिवारों का अध्ययन किया गया। उन परिवारों के कुल 3,95,080 लोगों का डेटा एकत्र किया गया, जिनमें 1,97,781 महिलाएं और 1,97,279 पुरुष शामिल हैं।
इतने बड़े सैंपल साइज के आधार पर मिलियन-प्लस शहरों और पूरे शहरी भारत में रोज़गार और आय से जुड़े विभिन्न पहलुओं की रिप्रेजेंटेटिव तस्वीर पेश की गई है।
इस सर्वेक्षण के माध्यम से भारत में रहने वाले लोगों की श्रम बल भागीदारी दर का पता चलता है। सबसे पहले यह समझना आवश्यक है कि ‘श्रम बल’ क्या है और इसमें कौन शामिल होता है? श्रम बल में वे सभी व्यक्ति शामिल होते हैं जो या तो किसी रोज़गार में लगे हुए हैं या फिर सक्रिय रूप से काम की तलाश कर रहे हैं अथवा काम करने के लिए उपलब्ध हैं।
रिपोर्ट की पेज संख्या 5 पर नीचे दी गयी टेबल दी गयी है :
भारत सरकार की रिपोर्ट की यह टेबल क्या बता रही है? यह टेबल बता रही है कि भारत के महानगरों में अभी भी जेंडर-आधारित भेदभाव बहुत ज्यादा हैI अगर इन महानगरों में रोजगार में महिलाओं की भागीदारी की तुलना, उच्च शिक्षा यानि कॉलेज स्तर की शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी के साथ करें तो हमें बहुत चौंकाने वाला तथ्य समझ में आता है। भारत के महानगरों में, उच्च शिक्षा में महिलाओं की भागीदारी 50% है। लेकिन महानगरों में रोजगार में महिलाओं की भागीदारी मात्र 27% ही है।
अब सवाल यह है कि इन दोनों आंकड़ों से हमें क्या समझ में आता है? इन आंकड़ों से हमें यह समझ में आता है कि हायर एजुकेशन में महिलाओं और पुरुषों की बराबर भागीदारी होने के बाद भी रोजगार में पुरुषों की भागीदारी महिलाओं की तुलना में तीन गुना ज्यादा है?
दिल्ली-विश्वविद्यालय के मेट्रो स्टेशन से अपने-अपने कॉलेजों को जाती लड़कियों की भीड़ से यह भ्रम बनता है कि महानगर पितृसत्ता और मर्दवाद की कैद से आजाद हैंI लेकिन हम जब नीचे दी गयी टेबल में दिये गए आंकड़ों को समझने की कोशिश करते हैं तो यह साफ़ हो जाता है कि महानगरों में पितृसत्ता की पैठ कोई कम नहीं है I
क्या महानगरों में मेट्रो, बसों आदि से उतरकर कॉलेजों में जाने वाली महिलाओं की 75% आबादी के दिल दिमाग में बीबी और माँ बनने का ख्वाब पल रहा है? क्योंकि, इस रिपोर्ट के आंकड़े तो यही बता रहे हैं कि उच्च-शिक्षा लेने के बावजूद, अधिकांश महिलाएँ चाइल्ड-केयर और होम-मेकिंग को स्वयं से किये गए वादे के रूप में देखती हैंI रिपोर्ट के अनुसार इन दो कामों के प्रति वे व्यक्तिगत रूप से कमिटेड हैं I यानि वे मान रही हैं कि वे ऐसा किसी दबाव में नहीं कर रही हैंI
उनकी ऐसी पहचान का बने रहना, इस बात का सबूत है कि 12 सालों की स्कूली शिक्षा और कम से कम तीन साल की उच्च-शिक्षा के दौरान, शिक्षा का पाठ्यक्रम, पितृसत्ता की जड़ों को हिलाने में कामयाब नहीं हो सका I
केवल केंद्र सरकार की बात करें तो वह स्कूली शिक्षा पर एक लाख 20 हज़ार करोड़ और उच्च-शिक्षा पर 50 हज़ार करोड़ रूपये खर्च करती है I अगर यह मान लिया जाए कि इसमें से आधा पैसा लड़कियों की शिक्षा पर खर्च होता है, तो फिर हम कह सकते हैं कि उनकी शिक्षा पर 85 हजार करोड़ रूपये खर्च हो रहे हैं। यदि इसमें राज्यों और परिवारों द्वारा किया जाने वाला खर्च भी जोड़ लें तो लड़कियों की शिक्षा पर किया जाने वाला इन्वेस्टमेंट कई लाख करोड़ में होगाI
इतना होने के बाद भी इन 15 सालों में उन्होंने जो योग्यता हासिल की है और जिन कुशलताओं में दक्षता प्राप्त की है उनका लाभ उत्पादन की दुनिया को नहीं मिल पा रहा है I इतने इन्वेस्टमेंट के बाद भी वे अपनी भूमिका प्रोडक्शन में नहीं, रि-प्रोडक्शन में ही मान रही हैं I क्योंकि पितृसत्ता ने उनसे जो उम्मीदें बांध रखी हैं, वे उन पर तो खरी उतर रही हैं, लेकिन उनसे, शिक्षा ने जो आस लगा रखी है उसको वे महत्त्वपूर्ण नहीं मानतीI
यह निष्कर्ष केवल मेरा या किसी दूसरे आम व्यक्ति का नहीं है I यह कहना है भारत सरकार का I भारत सरकार की यह रिपोर्ट बता रही कि गांवों में तो छोड़िए, मिलियन-प्लस शहरों में भी महिलाएँ पितृसत्ता द्वारा तय की गयी भूमिकाओं को ही महत्त्व दे रही हैंI
12 साल की स्कूली शिक्षा और 3 साल की कॉलेज शिक्षा भी पितृसत्ता की उन बेड़ियों को नहीं तोड़ पा रही है जो महिलाओं की पहचान को केवल ‘माँ’ या ‘पत्नी’ तक सीमित रखती हैं।
इस रिपोट के पेज नंबर 6 पर एक टेबल दी गयी है I
इस टेबल में दिया हुआ आंकड़ा हमको बता रहा है कि 70% महिलाएं रोजगार और उत्पादन की दुनिया से इसलिए दूर है क्योंकि बच्चों के लालन-पालन और होम-मेकिंग के प्रति उनका कमिटमेंट प्राथमिक है। जहाँ एक प्रतिशत पुरुष ने घरेलू कामों की वजह से स्वयं को रोजगार से दूर रखा है, वहीं करीब 70% महिलाओं ने घरेलू कामों की वजह से स्वयं को रोजगार से दूर रखा हैI यानि धरेलू कामों के प्रति महिलाओं का कमिटमेंट, पुरुषों की तुलना में 70 गुना ज्यादा हैI
जहाँ केवल 1% पुरुष घरेलू कामों के कारण रोजगार से दूर हैं, वहीं 70% महिलाओं के लिए घर की जिम्मेदारी, करियर की राह में सबसे बड़ी बाधा है।
वर्ल्ड बैंक ने अपनी एक रिपोर्ट में इसे मैरिज पेनल्टी और चाइल्ड-पेनल्टी कहा हैI वर्ल्ड बैंक ‘मैरिज पेनल्टी’ को महिलाओं के लेबर फ़ोर्स में शामिल होने और रोज़गार में आने वाली उस स्वतंत्र गिरावट के तौर पर परिभाषित करता है, जो शादी के तुरंत बाद लेकिन बच्चे होने से पहले होती है। वर्ल्ड बैंक के अनुसार, साउथ एशिया में भारत ऐसा देश है जहां मैरिज पेनल्टी सबसे ज्यादा है। यानि भारत में शादी के कारण महिलाएँ रोजगार से हाथ धो बैठती हैंI
यानि भारत में सबसे ज्यादा महिलाएँ शादी करने का दंड चुकती हैंI भारत सरकार की यह रिपोर्ट भी कह रही है कि यहाँ महिलाएँ शादी करने का दंड, अपना रोजगार खोकर चुकाती हैंI
यह स्थिति एक तरफ़ तो भारतीय समाज में पितृसत्तात्मक-संस्कृति की मजबूत और गहरी जड़ों का पता बताती हैं, वहीं दूसरी तरफ़ यह भी बताती है कि शिक्षा वैसी संस्कृति, समझ, और साहस विकसित करने में असफल रही है, जिसका वादा वो विभिन्न शिक्षा-आयोगों और शिक्षा-नीतियों के माध्यम से करती आयी हैI
यह एक बड़ा विचारणीय विषय है कि स्कूलों और कॉलेजों में लड़कों के बराबर अनुपात में पढ़ने वाली लड़कियाँ, आगे चलकर अचानक श्रम बल से कहाँ गायब हो जाती हैं। स्कूल से लेकर उच्च शिक्षा तक लड़कियाँ पढ़ाई के हर स्तर पर लड़कों के बराबर, और कई बार उनसे बेहतर प्रदर्शन करती दिखाई देती हैं। लेकिन जब बात नौकरी, करियर और आर्थिक आत्मनिर्भरता की आती है, तो वे काफी पीछे छूट जाती हैं।
ऐसे में यह सवाल उठना जरूरी है कि क्या पहली कक्षा से 12वीं तक, मुफ्त शिक्षा और कई योजनाओं के जरिए केंद्र व राज्य सरकारों द्वारा महिलाओं की पढ़ाई पर खर्च किए जाने वाले बजट का वास्तविक फायदा हो रहा है? बहुत बड़ी संख्या में पढ़ी-लिखी और योग्य महिलाओं की प्रतिभा का लाभ देश की अर्थव्यवस्था को नहीं मिल पा रहा है I
अगर इन महिलाओं को नौकरियों में पुरुषों के बराबर मौके मिलें, तो देश को और भी बेहतरीन डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक, वैज्ञानिक, अर्थशास्त्री, उद्यमी और नए विचार मिल सकते हैं। महिलाओ की श्रम बल में बढ़ी हुई भागीदारी न केवल लैंगिक समानता लाएगी, बल्कि इससे देश की आर्थिक प्रगति को भी एक नयी रफ्तार मिलेगी।
महिलाओं के श्रम बल से बाहर रहने के पीछे सबसे बड़ी वजह हमारे समाज और परिवार की पितृसत्तात्मक मानसिकता है। समाज आज भी महिला को मुख्य रूप से एक ‘अच्छी गृहिणी’, ‘आदर्श बहू’ या देख-रेख करने वाली भूमिका के इतर देखने में झिझकता है। हालांकि बड़े शहरों में इस सोच में कुछ हद तक बदलाव जरूर आया है, लेकिन ग्रामीण और छोटे कस्बों में आज भी लड़कियों की पढाई से ज्यादा प्राथमिकता उनकी शादी को दी जाती है।
चाहे बात संयुक्त परिवार की हो या न्यूक्लियर परिवार की, जब भी बच्चों की देखभाल या घर की जिम्मेदारियों के लिए किसी एक को करियर दांव पर लगाना हो, तो हमेशा महिला को ही त्याग करना पड़ता है।
मिलियन-सिटीज में महिलाओं के रोजगार पाने में मुख्य बाधा परिवार का ढांचा हैI इस रिपोर्ट से यह भी संकेत मिलता है कि पितृसत्तात्मक परिवार के खिलाफ और अपनी योग्यताओं और कुशलताओं के पक्ष में महिलाओं को जिस मात्रा में संघर्ष करना चाहिए, उस मात्रा में वे संघर्ष नहीं कर रही हैंI
मिलियन-सिटीज में महिलाओं के रोजगार पाने की राह में काम की जगह का दूर होना या काम का उपयुक्त जगह पर न होना इतने प्रभावी कारण नहीं हैं कि वे महिलाओं की रोजगार तक पहुँच में बाधा बन सकें I उनके और रोजगार के बीच पितृसत्तात्मक मान्यताएँ ही मुख्य कारण हैंI
हमारी इस चर्चा से यह स्पष्ट है कि भारत के 46 ‘मिलियन-प्लस’ शहर, जो प्रगति और आधुनिकता के प्रतीक माने जाते हैं, वहाँ भी एक गहरी लैंगिक असमानता मौजूद है। इन शहरों में जहाँ उच्च शिक्षा में लड़कियां, लड़कों के बराबर खड़ी हैं, वहीं श्रम बल में उनकी भागीदारी केवल 27% पर सिमट कर रह गई है। यह आंकड़ा हमें सोचने पर मजबूर करता है कि आखिर वह कौन सी दीवार है, जिसे पार करना आज भी भारतीय महिलाओं के लिए मुश्किल बना हुआ है।
इस रिपोर्ट के पेज नंबर 12 पर एक और आंकड़ा दिया हुआ है I
इन आंकड़ों से यह पता चलता है कि भारत के शहरों और मिलियन-सिटीज में पुरुषों और महिलाओं की औसत कमाई में काफी अंतर है। उदाहरण के लिए मिलियन-सिटीज में जहां सेल्फ एंप्लॉयड पुरुषों की 30 दिन की कमाई 34 हज़ार रूपये है, वहीं महिलाओं की कमाई मात्र 16 हज़ार रूपये ही है।
एक और उदाहरण लेते हैं। मिलियन-सिटीज में सैलरी पर काम करने वाले पुरुषों की 30 दिन की कमाई 31 हजार रूपये है, तो महिलाओं की 24 हज़ार रूपये। मिलियन-सिटीज में सैलरी पर काम कर रहे पुरुषों और महिलाओं की कमाई में 7 हज़ार यानि 23% का अंतर है।
क्योंकि इस लेख के दोनों लेखक शिक्षा के विद्यार्थी हैं, इसलिए हमारी यह जिम्मेदारी है कि हम सरकार के आंकड़ों से सामने आई महिलाओं की स्थिति में सुधार लाने के लिए शिक्षा की भूमिका पर भी बात करेंI
स्रोतों के अनुसार, लड़कियों की शिक्षा पर केंद्र सरकार, राज्य सरकारें और परिवार मिलकर हर साल कई लाख करोड़ रुपये खर्च कर रहे हैं। लेकिन जब 70% शिक्षित महिलाएँ केवल ‘होम-मेकिंग’ और बच्चों के पालन-पोषण की जिम्मेदारी के कारण पेशेवर दुनिया से बाहर रहती हैं, तो यह न केवल उनकी प्रतिभा का नुकसान है, बल्कि देश की अर्थव्यवस्था के लिए भी एक बहुत बड़ा अवसर खोने जैसा है।
हमारी शिक्षा प्रणाली डिग्री तो दे रही है, लेकिन वह उस पितृसत्तात्मक मानसिकता को हिलाने में विफल रही है जो महिलाओं को केवल ‘आदर्श बहू’ या ‘माँ’ की भूमिका तक सीमित रखती है।
पितृसत्तात्मक मानसिकता को चुनौती देने में शिक्षा की भूमिका महत्त्वपूर्ण हो सकती हैI इसके लिए शिक्षा को यह स्पष्ट करना चाहिए कि महिलाओं की भूमिका केवल ‘री-प्रोडक्शन’ तक सीमित नहीं है, बल्कि ‘प्रोडक्शन’ में भी उतनी ही महत्वपूर्ण है। पाठ्यक्रम के द्वारा महिलाओं को केवल ‘आदर्श बहू’ या ‘कुशल गृहिणी’ बनने के ख्वाब से बाहर निकालकर, उन्हें एक आर्थिक इकाई के रूप में स्वयं को देखने के लिए प्रेरित करना चाहिए।
पाठ्यक्रम में ऐसी रोल मॉडल्स और ऐसी कहानियों को शामिल किया जाना चाहिए जिनमें महिलाओं की पहचान उनके पेशे से जुड़ी हो, ताकि वे अपनी इस पहचान को प्राथमिकता के साथ महत्त्व दे सकें।
पाठ्यक्रम ऐसा होना चाहिए जो आर्थिक आत्मनिर्भरता को जीवन के एक अनिवार्य लक्ष्य के रूप में प्रस्तुत करे। जब तक शिक्षा का उद्देश्य केवल विवाह के लिए योग्यता प्राप्त करना रहेगा, तब तक महिलाएँ रोजगार की दुनिया से बाहर रहेंगी। शिक्षा को यह समझ विकसित करनी चाहिए कि पेशेवर केरियर का त्याग करना केवल व्यक्तिगत त्याग नहीं, बल्कि देश की प्रगति में भी बाधा है I
2024 में वर्ल्ड बैंक ने यह अनुमान लगाया कि अगर एशिया के देश महिलाओं को घरेलू कामों से मुक्त करके रोजगार के क्षेत्र में आने दें, तो इन देशों की जीडीपी कम-से-कम 13% बढ़ सकती है।
शिक्षा को केवल डिग्री देने का माध्यम बनने के बजाय एक ऐसा औजार बनना चाहिए जो महिलाओं के आत्म-बोध को बदले और उन्हें समाज द्वारा थोपी गई सीमित भूमिकाओं से मुक्त करेI
(रेखाचित्र एआई की मदद से)
(बीरेंद्र सिंह रावत और भावना रिखारी का लेख)
(रावत दिल्ली-विश्वविद्यालय के शिक्षाशास्त्र विभाग से संबद्ध थे और भावना दिल्ली-विश्वविद्यालय के शिक्षाशास्त्र विभाग में बीएड की विद्यार्थी हैं)